Thursday, September 18, 2025

सरदारगढ़ के ठाकुर और एक घोड़े का वचन




बेशक, यहाँ डोडिया राजपूतों के इतिहास से जुड़ी एक ऐसी कहानी है जो उनकी वीरता और वचनबद्धता को दर्शाती है। यह कहानी युद्ध की नहीं, बल्कि एक कठिन परिस्थिति में लिए गए एक साहसी और भावनात्मक निर्णय की है।

सरदारगढ़ के ठाकुर और एक घोड़े का वचन
यह कहानी उस समय की है जब मेवाड़ में महाराणा राज सिंह का शासन था और सरदारगढ़ के जागीरदार ठाकुर धवल सिंह डोडिया थे। ठाकुर धवल सिंह न केवल एक वीर योद्धा थे, बल्कि अपने वचन के पक्के और अपने घोड़ों से गहरा प्रेम रखने वाले इंसान भी थे। उनके पास एक अद्भुत सफेद घोड़ा था, जिसका नाम 'विजय' था। यह घोड़ा इतना तेज और वफादार था कि मानो उसकी और ठाकुर की आत्मा एक ही हो।

एक बार, महाराणा राज सिंह किसी अभियान पर जाने वाले थे। उनके दरबार में सेना के लिए सबसे तेज घोड़े को लेकर चर्चा चल रही थी। तभी कुछ लोगों ने ठाकुर धवल सिंह के घोड़े 'विजय' की प्रशंसा की। महाराणा ने 'विजय' को देखने की इच्छा व्यक्त की।

ठाकुर धवल सिंह, सम्मानपूर्वक 'विजय' को लेकर दरबार में पहुँचे। महाराणा ने जैसे ही 'विजय' को देखा, वह उसकी सुंदरता और ताकत पर मुग्ध हो गए। उन्होंने ठाकुर से कहा, "ठाकुर, हमें आपके इस घोड़े की आवश्यकता है। यह हमारी सेना का सबसे तेज घोड़ा बनेगा।"

यह सुनकर ठाकुर धवल सिंह कुछ पल के लिए शांत हो गए। उनके लिए 'विजय' सिर्फ एक जानवर नहीं था, बल्कि एक साथी था। वे जानते थे कि युद्ध में एक घोड़ा अपने सवार की जान बचा सकता है, और 'विजय' ने कई बार उनकी रक्षा की थी। लेकिन महाराणा का आदेश था, और वे मेवाड़ के प्रति अपनी निष्ठा से बँधे थे।

ठाकुर ने सिर झुकाकर कहा, "महाराणा, यह घोड़ा आपके लिए प्रस्तुत है। लेकिन मेरी आपसे एक विनती है।"
"कहो, ठाकुर," महाराणा ने पूछा।
ठाकुर ने कहा, "महाराणा, मैंने इस घोड़े को वचन दिया है कि इसकी पीठ पर कोई और सवार नहीं होगा। अगर यह आपकी सेवा में जाएगा, तो आप इसे कभी किसी और को मत देना।"

महाराणा मुस्कुराए और उन्होंने ठाकुर की इस अनोखी निष्ठा को समझा। उन्होंने कहा, "हम तुम्हें वचन देते हैं, ठाकुर। यह घोड़ा हमारी सेना में रहेगा, और इसकी पीठ पर केवल हम ही सवार होंगे, या यह हमारी सेना के गौरव को बढ़ाएगा।"

ठाकुर धवल सिंह ने भारी मन से अपने प्यारे घोड़े को महाराणा को सौंप दिया। लेकिन 'विजय' ने भी अपने मालिक को नहीं भुलाया। कहा जाता है कि जब भी ठाकुर दरबार में आते, 'विजय' उनकी आहट पहचान लेता और खुशी से हिनहिनाने लगता।

एक बार की बात है, एक महत्वपूर्ण युद्ध के दौरान, महाराणा को अचानक एक गोपनीय संदेश भेजना पड़ा। उन्होंने 'विजय' पर संदेशवाहक को भेजा। लेकिन 'विजय' ने उस अनजान सवार को स्वीकार नहीं किया और रास्ते में ही उसे गिरा दिया। तब महाराणा को ठाकुर का वचन याद आया। उन्होंने समझा कि 'विजय' केवल अपने स्वामी के लिए ही नहीं, बल्कि उस वचन के लिए भी वफादार था जो उसे दिया गया था।

महाराणा राज सिंह ने उस दिन के बाद 'विजय' की पीठ पर कभी किसी और को नहीं चढ़ने दिया। 'विजय' ने अपना जीवन महाराणा की सेना में रहकर बिताया, लेकिन उसकी वफादारी की कहानी और ठाकुर धवल सिंह के अपने वचन के प्रति प्रेम की मिसाल हमेशा के लिए मेवाड़ के इतिहास में दर्ज हो गई।

यह कहानी दिखाती है कि डोडिया राजपूतों के लिए साहस केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं था, बल्कि यह उनके गहरे नैतिक मूल्यों और अपने दिए गए वचन के प्रति अटूट निष्ठा में भी झलकता था।


कुंदन सिंह डोडिया S/O ठाकुर हिरा सिंह डोडिया 
ठिकाना – नरदास का गुड़ा, दिवेर मेवाड़ [सरदारगढ़]
तहसील - देवगढ़
जिला - राजसमंद 
Contact = 9166288080

Whatsapp Number = 9166288080






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